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य़दा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवती भारत |
अभ्युत्यानमर्ध्मस्य तदाऽऽत्मनं सृजाम्यहम् | |




संपूर्ण ही ब्राह्मण वर्ण का विवरण हमने अपने ब्राह्मण निर्णय ग्रंथ में लिखा है तहाँ 324 प्रकार की ब्राह्मण जातियों का विवरण हमनें विस्तृत रुप से लिखा है परन्तु कान्यकुब्ज ब्राह्मणों में से आस्पद व कुल उपाध्यिें हमें एक कूर्माचलय उप्रेती ब्राह्मणों के अतिरिक्त किसी ब्राह्मण समुदाय में नहीं मिली अतएव हमें भी विश्वास होता है कि आजकल की स्थिति इन कान्यकुब्जों की कैसी भी हो यथार्थ में प्राचीन ब्राह्मण कहाने के अधिकारी ये ही हैं |


उपाधियें


1.पांडे
2.त्रिपाठी
3.मिश्रा
4.पाठक
5.अवस्थी
6.उपाध्याय
7.द्विवेदी
8.भट्टाचार्य
9.त्रिवेदी
10.शुक्ल
11.वाजपेयी
12.दीक्षित
13.चतुर्वेदी
14.अग्निहोत्री


यह पदवियें कान्यकुब्ज ब्राह्मणों को इनके गुडकर्मों के कारण मिली थी जैसे बालकों को आरंभिक शिक्षा देने के कारण पांडे कहाये, सहिंता के पढ़ाने के कारण पाठक हलाये, जिन कुलों में दो वेद अवश्य पढ़ लेने का नियम था वे द्विवेदी, जो तीन वेद अवश्य पढ़ते थे वे त्रिवेदी और जिन कुलों में चारों वेदों का अध्यन होता था वे चतुर्वेदी कहाये जो तीन वेद के पढ़े हुये थे वे त्रिपाठी पुकारे जाते थे ,जो धार्मिक विषयों में व्यवस्था देने वाले थे वे व्यवस्थी व्यवस्थों कहाते कहाते अवस्थी अवस्थी कहने लगे जो लोग गुरुदीक्षा दिया करते थे वह दिक्षित कहाये श्रोत स्मर्ता कर्मकांड करने कराने से मिश्र कहाये , जिन कुलों में नित्य अग्निहोत्र हुआ करते थे वह अग्निहोत्री हुए यजुर्वेद संहिता दो है शुक्ल और कृष अत: जो ब्राह्मण शुक्ल यजुर्वेद को पढ़ते थे वे शुक्ल कहाये और मिश्राई करने से बाने यजमानों के यहॉँ पाठ पूजन करते कराते थे वे मिश्र कहाये ,व्याकरण शास्त्र के पढ़ाने वाले उपाध्याय कहाये जो वेदज्ञ ब्राह्मण मृतक संस्कार व मृतक क्रिया कराने वाले में मुख्य होते थे भट्टाचार्य कहाये,जिन्होंने द्रव्य खर्च करके यह करवाया और विद्वानों का बड़ा समानता किया वे वाजपेयी कहाये

इन ब्राह्मणों की प्रसिद्धि इनके ग्रामों के नामों के साथ-साथ होती है अर्थात् जिस जिस ग्राम से इन का वंश विस्तार हुआ है उसी ग्राम के नाम के साथ-साथ उनकी भी प्रसिद्धि है जैसे शाहाबाद से निकास होने से शहबाद के मिश्रा, रामपुर से निकास होने से रामपुर के मिश्रा आदि

कस्यप श्च भरद्वाजोशांडिल्य: सांकृतस्तथा | कात्यानोपमन्यु श्च काश्यप श्च धनञ्जयं: ||
कविस्तो गौतमौं गर्गो भरद्वाजस्तथैवच | कौशिकश्च वशिष्ठश्च वत्य:पाराशरस्तथा ||



कान्यकुब्जों के गोत्र



1.कश्यप 2.कौशिक 3.धनञ्जय 4.गर्ग 5.भरद्वाज 6.उपमन्यु 7,वशिष्ठ 8.भारद्वाज 9.शांडिल्य 10.काव्ययन 11.कविस्त 12.वत्स 13.सांकृत 14.काश्यप 15.गौतम. 16.पाराशर


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